बुरहानपुरमध्य प्रदेश

भारत एक पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य है

बुरहानपुर (अकील ए आज़ाद) धर्म और धर्म के बनाए हुए नियम इंसानी ज़िंदगी की खुशहाली के लिए बनाए गए हैं। प्रत्येक धर्म अपने उपदेशों में मानव कल्याण की शिक्षा देता है। इंसानियत की भलाई के सैंकड़ों उपदेश मौजूद है, यहां तक कि किसी दूसरे इंसान को पीड़ा न पहुंचे उसके लिए भी पवित्र ग्रहंतों में अनेकों उपदेश मिलते हैं जिस में यहां तक कहा गया है कि किसी को घमंड कर इतराकर चलने की भी पाबंदी है यह ग्रन्थ इतरा कर चलने से भी रोकते हैं जहां पवित्र ग्रन्थों में जमीन पर फसाद करने वालों की निंदा की गई है, वहीं दूसरी तरफ किसी बेगुनाह का कत्ल करने वाले को सारी इंसानियत का कातिल कहा गया है। इन ग्रंथो के सारे उपदेश जन भावनाओं से ओत परोत हैं भारत एक पंथ निरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य है, जिसमे संविधान ने सभी धर्मों और जातियों के लोगों को समान अधिकार और अवसर दिए जाने की बात कहीं गई है जिसे समान नागरिक संहिता भी कहा जाता है भारत के संविधान निर्माताओं द्वारा उसे आने वाले समय में, लागू करने की बात की गई थी। देश आजाद होने के 75 साल बाद अब शायद यही उपयुक्त समय है कि देश में समान नागरिक संहिता को लागू किया जाए। सबसे पहले तो हमें इस बात को समझना होगा कि समान नागरिक संहिता किसी भी रूप में धर्म के सिद्धांतों के विपरीत नहीं है, परिस्थितियों के आधार पर नियम और कानून बनाए जाना समय की आवश्यकता होता है जो इंसानी भलाई के लिए कानून बनाए जाने या एक ऐसे देश में जहां मुख्तलिफ नज़रियात मजाहिब और फिक्र के लोग रहते हैं, उन सब पर एक कानून की हुकूमत होना चाहिए। समान नागरिक संहिता नागरिकों को समान रूप से दांडिक और दीवानी विधि के दायरे में लाना चाहती है, आईपीसी और दूसरी दंड विधियों के द्वारा दांडिक विधि समस्त भारत में, समान रूप से लागू है, और बहुत से दीवानी मामलों में भी, समान नागरिक संहिता के ही तरह के नियम हैं, सरकारी नौकरी में, समान रूप से नियम लागू हैं। समान नागरिक संहिता के द्वारा धर्म के आंतरिक मामलों में कोई हस्तक्षेप नहीं किया जा रहा है। वर्तमान में समान नागरिक संहिता लागू करने को लेकर राजनीति गर्म है राजनेता इसे लेकर अपनी राजनीति कर रहे हैं महत्वपूर्ण तथ्य यह है, कि कुछ लोगों के द्वारा समानता के अधिकार की प्रतीक समान नागरिक संहिता का विरोध किया जाना हास्यास्पद लगता है। जो लोग इसका विरोध धर्म और आस्था के नाम पर कर रहे हैं, विरोध स्पष्ट करता है की मात्र राजनीति के चलते किसी खास को टारगेट करने के नाम पर विरोध किया जा रहा है। जबकि ऐसा कुछ भी नहीं है, सामान नागरिक संहिता सभी धर्मों के लोगों को समान अधिकार दिलाने के लिए ही है। लेकिन इस मामले को लेकर राजनीतिक स्टैंड अलग-अलग है जिससे साधारण सा मामला उलझ कर रह गया है।

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