Thursday, October 15, 2026
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सोशल मीडिया के इस दौर में धार्मिक ग्रंथो की गलत व्याख्या हो रही प्रचारित

बुरहानपुर (अकील ए आज़ाद) इस्लाम प्रत्येक मानव जीवन को मूल्यवान मानता है और इंसान को सत्य, न्याय, करुणा तथा विवेक के साथ जीवन जीने की शिक्षा देता है। इस्लाम केवल इबादत का मार्ग नहीं, बल्कि इंसान की व्यक्तिगत, सामाजिक और नैतिक जिंदगी को बेहतर बनाने वाली जीवन-पद्धति भी है। कुरआन की पहली आयत में ही “इक़रा” अर्थात पढ़ने का संदेश दिया गया। यह इस बात का प्रतीक है कि इस्लाम में ज्ञान और शिक्षा काकितना महत्वपूर्ण स्थान है। ज्ञान का उद्देश्य केवल अधिक जानकारी हासिल करना नहीं बल्कि सही और गलत में अंतर करने की क्षमता विकसित करना भी है। इस्लाम इंसान को सोचने, समझने और सत्य की खोज करने के लिए प्रेरित करता है। कुरआन में बार-बार इंसान को चिंतन मनन करने और अपनी बुद्धि का उपयोग करने की ओर प्रेरित किया गया है। इसलिए किसी भी बात को बिना जांचे परखे स्वीकार कर लेना इस्लामी शिक्षाओं की भावना के अनुरूप नहीं है।आज का दौर सूचना क्रांति का दौर है। सोशल मीडिया, ऑनलाइन वीडियो और मैसेजिंग प्लेटफॉर्म ने दुनिया को बेहद करीब ला दिया है। कुछ ही क्षणों में कोई भी जानकारी लाखों लोगों तक पहुंच सकती है। इससे ज्ञान प्राप्त करने के अवसर बढ़े हैं, लेकिन इसके साथ गलत सूचनाओं, अफवाहों और धार्मिक ग्रंथों की अधूरी अथवा गलत व्याख्याओं का प्रसार भी बढ़ा है। ऐसे समय में मुसलमानों की जिम्मेदारी और अधिक बढ़ जाती है कि वे किसी धार्मिक संदेश को आगे बढ़ाने से पहले उसकी सत्यता की जांच करें। किसी आयत या हदीस को संदर्भ से हटाकर प्रस्तुत करना लोगों को भ्रमित कर सकता है। धार्मिक ज्ञान के लिए विश्वसनीय विद्वानों और प्रमाणिक स्रोतों का सहारा लेना चाहिए।इस्लाम हमें सिखाता है कि ज्ञान के साथ विवेक, आस्था के साथ समझ और सूचना के साथ सत्यापन आवश्यक है। यही दृष्टिकोण समाज में शांति, न्याय, भाईचारे और सद्भाव को मजबूत कर सकता है।

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