स्थानीय परंपराएँ विभिन्न समुदायों के बीच परस्पर सम्मान और शांतिपूर्ण की भावना को दर्शाती हैं

बुरहानपुर (अकील ए आज़ाद) भारत के कोने-कोने में धार्मिक पर्व अत्यंत धार्मिक आस्था, गंभीर गरिमा और व्यापक शांतिपूर्ण सह भागिता के साथ मनाए जाते हैं जिसमें इस्लाम धर्म के मोहर्रम पर्व का अपना एक अलग स्थान है इस पवित्र अवधि की पहचान बनने वाले पारंपरिक मातमी जुलूसों और गहन शोक-प्रदर्शन से आगे बढ़कर, देश के अनेक कस्बों और गाँवों में अंतरधार्मिक सौहार्द के उल्लेखनीय उदाहरण भी देखने को मिले। इन स्थानों पर विभिन्न पृष्ठभूमियों और अलग अलग धर्मों से जुड़े लोगों ने पीढ़ियों से चली आ रही स्थानीय परंपराओं में सक्रिय रूप से भाग लिया और सामाजिक सद्भाव, आपसी सम्मान तथा भाईचारे की भावना को और अधिक सुदृढ़ किया।मध्य प्रदेश के विदिशा राजस्थान के जयपुर सहित अन्य प्रदेशों में पीढ़ियों से चली आ रही श्रद्धा की परंपरा आज भी सुहागपुर तरीके से मना कर भाईचारे का संदेश दिया जाता रहा है। मध्य प्रदेश के विदिशा नगर में हिंदू परिवार वार्षिक मुहर्रम आयोजनों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। कई दशकों से यह हिंदू परिवार बावड़ी वाले बाबा की दरगाह की सेवा करता आ रहा है। यह दरगाह एक हनुमान मंदिर के ठीक सामने स्थित है। आमने-सामने स्थित होने के कारण श्रद्धालु दोनों स्थानों पर जाकर श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं, जो नगर की साझा सांस्कृतिक विरासत और आपसी सौहार्द का प्रतीक है हर वर्ष मुहर्रम केदौरान यह परिवार बाबा के जुलूस की संपूर्ण व्यवस्था करता है। वर्तमान में परिवार की पाँचवीं पीढ़ी भी इसी परंपरा को पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ आगे बढ़ा रही है। जिसे देखने और श्रद्धा व्यक्त करने के लिए विदिशा तथा आसपास के क्षेत्रों से हजारों लोग एकत्रित होते हैं।यह हिंदू परिवार पाँच पीढ़ियों से लगातार बाबा का जुलूस निकालने की परंपरा का निर्वहन कर रहा है।इसी प्रकार जयपुर के महाराजा के महल से सोने का ताजिया महल से निकलकर शहर की विभिन्न शहरों से होकर पुणे वापस महल में रखा जाता है या सैकड़ो वर्ष पुरानी परंपरा आपसी सद्भाव का प्रतीक मानी गई है जयपुर के महल से निकलने वाला यह ताजिया अभी हिंदू मुस्लिम एकता और आपसी सद्भाव को बढ़ावा देता है!



