फितरा और जकात का महत्व – रमजान में अमीर और गरीब के लिए एक समान कर्तव्य

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बुरहानपुर (अकील ए आज़ाद) इस्लाम में रमजान का महीना न केवल इबादत, बल्कि परोपकार और सामाजिक समानता का भी प्रतीक है। इस पवित्र महीने में मुसलमानों पर फितरा और जकात अदा करना अनिवार्य होता है, जिस का समाज में आर्थिक संतुलन बनाए रखना है जिस से गरीबों की जरूरतें पूरी हो सकें। फितरा को सदका-ए-फित्र भी कहा जाता है। यह एक अनिवार्य दान होता है, जिसे ईद उल-फित्र से पहले अदा करना जरूरी होता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि गरीब और जरूरतमंद लोग भी ईद की खुशियों में शामिल हो सकें। यह दान हर मुसलमान पर वाजिब है, चाहे वह अमीर हो या गरीब, और इसे रोजे की पाकीजगी को पूरा करने का एक माध्यम माना जाता है। फितरा की रकम तय होती है, जो आमतौर पर अनाज या उसकी कीमत के रूप में दी जाती है। जकात इस्लाम के पांच स्तंभों में से एक है, जिसका उद्देश्य समाज में आर्थिक असमानता को कम करना है। यह मुसलमानों की कुल सालाना आय और बचत का 2.5% हिस्सा होता है, जो जरूरतमंदों, गरीबों, अनाथों, विधवाओं और अन्य असहाय लोगों की मदद के लिए दिया जाता है। जकात सिर्फ एक धार्मिक कर्तव्य ही नहीं, बल्कि यह समाज में आर्थिक संतुलन और न्याय को बनाए रखने का एक महत्वपूर्ण माध्यम भी है।
बुरहानपुर, जो अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत के लिए प्रसिद्ध है, रमजान के दौरान सामाजिक एकता और भाईचारे का संदेश फैलाता है। यहां के लोग फितरा और जकात अदा करने में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं, जिससे गरीबों और जरूरतमंदों को राहत मिलती है। रमजान हमें सिर्फ रोजा रखने और इबादत करने की ही सीख नहीं देता, बल्कि यह हमें अपने आसपास के जरूरतमंदों की मदद करने और समाज में दया, प्रेम और समानता फैलाने का भी संदेश देता है। यही कारण है कि फितरा और जकात इस पवित्र महीने में विशेष महत्व रखते हैं।

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