मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी के द्वारा “सिलसिला तलाशे जौहर” के तहत व्याख्यान एवं रचना पाठ आयोजित

बुरहानपुर (अकील ए आज़ाद) मध्य प्रदेश उर्दू अकादमी, संस्कृति परिषद, संस्कृति विभाग के तत्त्वावधान में सिलसिला एवं तलाशे जौहर के तहत व्याख्यान एवं रचना पाठ का आयोजन किया गया अंसार इफ़्तिख़ार हायर सेकेंडरी स्कूल, चंद्रकलां, बुरहानपुर में ज़िला समन्वयक शऊर आश्ना के सहयोग से किया गयाबुरहानपुरमें आयोजितसिलसिला एवं तलाशे जौहर के लिए मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी की निदेशक डॉ नुसरत मेहदी ने अपने संदेश में कहा कि सिलसिला एवं तलाशे जौहर’ उर्दू अकादमी का ऐसा महत्वपूर्ण अभियान है, जिसका उद्देश्य नई साहित्यिक प्रतिभाओं की खोज, उनका प्रोत्साहन तथा वरिष्ठ और युवा रचनाकारों के बीच रचनात्मक संवाद स्थापित करना है। जहां तक आज के बौद्धिक सत्र के विषय की बात है तो उर्दू साहित्य में स्त्री-विमर्श स्त्री के अनुभवों, संवेदनाओं संघर्ष और अस्मिता का सशक्त साहित्यिक लेखा जोखा है, जिसे समझना और नई पीढ़ी तकपहुँचाना समय की आवश्यकता है। बुरहानपुर ज़िले के समन्वयक शऊर आश्ना ने बताया कि कार्यक्रम दो सत्रों पर आधारित था। प्रथम सत्र में रात 8:30 बजे तलाशे जौहर प्रति योगिता आयोजित की गई जिसमें ज़िले के नये रचनाकारों ने तात्कालिक लेखन प्रतियोगिता में भाग लिया। निर्णायक के रूप में बुरहानपुर के वरिष्ठ शायर जमील असग़र एवं रियासत अली रियासत मौजूद रहे जिन्होंने प्रति भागियों शेर कहने के लिए दो तरही मिसरे दिये। दिये गये मिसरों पर नए रचनाकारों द्वारा कही गई ग़ज़लों एवं उनकी प्रस्तुति के आधार पर शकील एजाज़ ने प्रथम,रशीद अंबर ने द्वित्तीय एवं इमरान शाहिदी ने तृतीय स्थान प्राप्त किया। प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय स्थान प्राप्त करने वाले तीनों विजेता रचनाकारों को उर्दू अकादमी द्वारा पुरस्कार राशि 3000, 2000, और 1000, एवं प्रमाण पत्र दिए गए दूसरे सत्र में रात 9 30 बजे सिलसिला के तहत व्याख्यान एवं रचना पाठ का आयोजन हुआ जिस की अध्यक्षता वरिष्ठ शायर जमील असग़र ने की। वहीं विशिष्ट अतिथियों के रूप में आरिफ़ अंसारी अलीग, एडवोकेट अब्दुल क़ादिर शेख़ एवं वाजिद इक़बाल आदि मंच पर उपस्थित रहे। इस अवसर पर वक्ता डॉ आरिफ़ अंसारी ने उर्दू शायरी एवं साहित्य में स्त्री विमर्श विषय पर वक्तव्य प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा उर्दू साहित्य में स्त्री विमर्श के सिद्धांत के तहत केवल महिलाओं के अपने अधिकारों की बात ही नहीं की जाती, बल्कि यह सिद्धांत समाज में शिक्षा, साहित्य और अन्य घरेलू, राजनीतिक व आर्थिक मोर्चों पर पुरुषों की तरह महिलाओं को भी समान अधिकार दिए जाने की वकालत कि गई। उर्दू साहित्य और शायरी में स्त्री विमर्श की यह अवधारणा एक सशक्त माध्यम के रूप में उभरी है, जहाँ महिला रचनाकारों ने अपनी क़लम को आत्म-अभिव्यक्ति, पहचान और सामाजिक प्रतिरोध का हथियार बनाया। बीसवीं सदी में किश्वर नाहिद जैसी शायरात ने अपनी बेबाक शायरी और गद्य (जैसे ‘बुरी औरत की कथा’) के ज़रिए पुरुष-सत्तात्मक पाबंदियों को सीधी चुनौती दी, वहीं परवीन शाकिर ने महिलाओं की आंतरिक भावनाओं घरेलू सामाजिक अनुभवों और प्रतिरोध की आवाज़ को शायरी में बख़ूबी पिरोया। अफ़साना निगारी के क्षेत्र में इस्मत् चुग़ताई ने ‘लिहाफ़’ और ‘चौथी का जोड़ा’ जैसी साहसिक रचनाओं के माध्यम से महिलाओं के मानसिक व सामाजिक उत्पीड़न पर से पर्दा उठाया। इस प्रकार उर्दू शायरी और साहित्य में स्त्री विमर्श ने महिलाओं को मात्र सहानुभूति का पात्र मानने के बजाय उन्हें समाज में एक स्वतंत्र, चेतनाशील और समान अधिकारों से लैस इंसान के रूप में स्थापित किया है। रचना पाठ में जिन शायरों ने अपना कलाम पेश किया उसमें जमील अजगर वाली शामिमि जाहिद वारसी तफ़ज़िल ताबिश रियासत अली रियासत डा फारूक राहिल, ताज मोहम्मद ताज, नईम नवाज, जावेद राना, अल्ताफ अनवर, तालिब हाशमी के अलावा संदीप शर्मा, संतोष परिहार, राजेन्द्र मिश्रा एवं डॉ सुभाष माने ने अपना कलाम पेश किया। कार्यक्रम का संचालन शऊर आशना क्र द्वारा कर सभी का आभार माना।



