गणतंत्र और भारतीय संविधान ने भारत को धर्मनिरपेक्ष गणराज्य के साथ जोड़ा

0
116

बुरहानपुर (अकील ए आज़ाद) देश आजाद हुवा1947 में लेकिन उसे गणतंत्र का दर्जा 1950 में मिला जिसमें भारत देश के लिए एक कानून बनाकर पूरे देश में लागू किया गया आजादी गणतंत्र के जन्म का ही प्रतीक नहीं है इसने उन लोगों के बीच एक नैतिक और राजनीतिक समझौते पर हस्ताक्षर का संकेत दिया, जिन्होंने उपनिवेशवाद का सामना किया था और विभाजन की पीड़ा को सहा था। भारतीय मुसलमानों के लिए, गणतंत्र एक ऐतिहासिक पल था जहाँ हज़ार वर्षों के बाद भारतीय संविधान को कानूनी दृष्टि से देखना इसकी आत्मा को न समझना है; यह हर मायने में न्याय का एक पवित्र बन्धन है जो एक बहुलवादी दुनिया में गरिमा, आस्था और प्रगति के जीवन का ढांचा प्रदान करता है। संवैधानिक प्रतिबद्धता, इस्लाम के अदल पूर्ण न्याय के आदेश का आधुनिक माध्यम है। संविधान, जो अधिकार की रक्षा करता है, बलवानों के विरुद्ध कमजोरों की सुरक्षा की गारंटी देता है और यह सुनिश्चित करता है कि प्रत्येक नागरिक कानून के समक्ष समान है, यह याद रखना आवश्यक है कि संविधान सभा में बैठे मुस्लिम नेताओं ने उस दस्तावेज़ के निर्माता के रूप में काम किया जिसे वे सामाजिक-राजनीतिक जीवन में लागू करना चाहते थे। मौलाना अबुल कलाम आज़ाद और सैयद मोहम्मद सादुल्लाह जैसे नेताओं ने मुस्लिम पहचान को धर्मनिरपेक्ष गणराज्य के साथ जोड़ा जो केवल एक कानूनी दस्तावेज से कहीं अधिक है,भारतीय मुस्लिम समुदाय संविधान को अपने धर्म के लिए चुनौती नहीं, बल्कि राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक जीवन की सर्वोच्च सुरक्षा मानता है। भारत का संविधान ही वह नींव है जिस पर हमारा गणतांत्रिक स्वरूप टिका है, जो सुनिश्चित करता है कि हम जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों द्वारा शासित हैं और हमारे अधिकार सुरक्षित रहें।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here