बुरहानपुर (अकील ए आज़ाद) कृषि प्रधान देश में पोला भारतीय संस्कृति का एक अंग है पोला पर्व किसान और बैल के रिश्ते में कृतज्ञता का उत्सव भारत की कृषि प्रधान संस्कृति में पोला पर्व किसान और उसके सबसे महत्वपूर्ण कृषि साथी बैल के प्रति सम्मान, कृतज्ञता और स्नेह का प्रतीक है। यह मुख्य रूप से महाराष्ट्र मध्यप्रदेश छत्तीसगढ़, कर्नाटक और तेलंगाना के ग्रामीण क्षेत्रों में मनाया जाता है। मध्यप्रदेश के बुरहानपुर सहित कई इलाकों में भी इसकी विशेष परंपरा है पोला पर्व आम तौर पर अमावस्या के दिन मनाया जाता है। अलग-अलग क्षेत्रों में तिथि की परंपरा में अंतर मिलता है। महाराष्ट्र में इसे श्रावण अमावस्या यानी पिठोरी अमावस्या के रूप में मनाया जाता है, जबकि मध्यप्रदेश के कुछ क्षेत्रों में भाद्रपद अमावस्या को पोला मनाने की परंपरा है। इस वर्ष पोला पर्व 10 सितंबर गुरुवार को मनाया जा रहा है। पोला पर्व के दिन बैल को मिलता है आराम और सम्मान पोला के दिनकिसान अपने बैलों को सजा कर उनके सींगों पर रंग लगाते हैं। उन्हें फूलों की माला, घंटियों, कपड़ों और आकर्षक साज सज्जा से सजाया जाता है। इसके बाद विधि-विधान से पूजा कर उन्हें विशेष भोजन कराया जाता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस दिन बैलों से खेत में काम नहीं कराया जाता, बल्कि उन्हें पूरा आराम दिया जाता है।बुरहानपुर में बैलों की शोभायात्रा, पारंपरिक कार्यक्रम और प्रति योगिताएं भी आयोजित होती हैं। पड़ोसी राज्य महाराष्ट्र केकिसानों का खास पर्व पोला मूल रूप से किसान और ग्रामीण समाज का पर्व है। खेती में बैलों के योगदान को याद करते हुए किसान इस दिन उनके प्रति आभार जताता है। आधुनिक दौर में ट्रैक्टर और मशीनों के बढ़ते इस्तेमाल के बावजूद खेती किसानी में बैलों का इस्तेमाल किया जाता है पोला ग्रामीण भारत की उस कृषि संस्कृति को जीवित रखे हुए है, जिसमें इंसान, पशु और प्रकृति के बीच गहरा संबंध रहा है। पोला केवल बैल पूजा का पर्व नहीं, बल्कि मेहनत, प्रकृति, पशु-प्रेम और किसान जीवन के सम्मान का संदेश देने वाला भारतीय सांस्कृतिक उत्सव है जो जो धर्म जाति और समाज के बंधनों से ऊपर उठकर मनाया जाने वाला पर्व है।


