उर्दू और फारसी अदब की हिफ़ाज़त और तरक़्क़ी में नवाबों का योगदान

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बुरहानपुर (अकील ए आज़ाद) हिंदुस्तान के तारीख़ी विरसे का अहम हिस्सा नवाब रहे है। टोंक रियासत न सिर्फ़ इल्म-ओ-अदब का मरकज़ रही, बल्कि यहाँ की लाइब्रेरी ने उर्दू और फारसी की अनमोल किताबों, हस्तलिखित पांडुलिपियों और दीन-ओ-दुनिया से जुड़ी तहरीरों को संजो कर आने वाली नस्लों तक पहुँचाया इस लाइब्रेरी में दुनिया का सबसे बड़ा कुरान शरीफ भी हिफाजत के साथ महफूज है। इलमोअदब में नवाब टोंक ने हमेशा उलमा, शायरों और विद्वानों को संरक्षण दिया, जिससे टोंक अदबी गतिविधियों का एक रौशन सितारा बन गया। नवाब टोंक की खिदमतें सिर्फ़ अदब तक सीमित नहीं रहीं। उन्होंने आम लोगों की भलाई के लिए भी कई मिसाली काम किए। खास तौर पर हज पर जाने वाले लोगों के लिए सऊदी अरब में मुख्तलिफ इमारतों की तामीर करवाई गई, जहाँ हिंदुस्तान से जाने वाले हाजियों के ठहरने का मुफ्त इंतज़ाम किया जाता था। यह उस दौर में एक बहुत बड़ा समाजी और इंसानी कदम था, जिसने हज़ारों हाजियों को सहूलियत और राहत दी।आज भी नवाब टोंक का खानदान अंजुमन के अध्यक्ष यूनुस अली खान सलीम भाई सहित पूर्व पार्षद जाकिर खान रिवायतों को ज़िंदा रखे हुए है। खानदान के लोग समाजी, तालीमी और इंसानी खिदमतों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहे हैं। मौजूदा दौर में इसी खानदान से जुड़े नौजवान भी कौम की खिदमत को अपना मक़सद बनाए हुए हैं। वे तालीम के फ़रोग़, सांस्कृतिक विरसे की हिफ़ाज़त और समाजी जागरूकता के लिए काम कर रहे हैं।नवाब टोंक की यह विरासत हमें यह सिखाती है कि इल्म, इंसानियतऔर खिदमत-ए-ख़ल्क़ किसी भी समाज की असली पूँजी होती है। आज की पीढ़ी के लिए यह एक मिसाल है कि किस तरह अपने अतीत पर फ़ख़्र करते हुए, मौजूदा दौर में भी समाज के लिए कारगर और सकारात्मक योगदान दिया जा सकता है।

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