बुरहानपुर (अकील ए आज़ाद) देश के अरबी फारसी शोध संस्थान टोंक राजस्थान में आगामी 18 जनवरी को एक सेमिनार का आयोजन संस्थान की ओर से किया गया है जिसमें देश भर के स्कॉलर इस संस्थान की अहमियत और वर्तमान स्थिति पर अपने शोध पत्र पढ़ेंगे, इस संबंध में जानकारी देते हुए पूर्व पार्षद जाकिर खान ने एक वक्तव्य जारी कर बताया कि देश का यह एक मात्र ऐसा रिसर्च सेंटर है जहां अरबी और फारसी पर रिसर्च की जाती है अरबी-फारसी शोध संस्थान की अहमियत एवं वर्तमान हालात विषय पर आधारित एक सेमिनार का आयोजन रविवार को दो सत्र में आयोजित किया गया है पहला सत्र सुबह साढे 9 बजे होगा। जब के दूसरा सत्र दोपहर 2 बजे से आयोजित किया जाएगा कार्यक्रम में कई क्षेत्रों से आए स्कॉलर मौजूद रहेंगे। सेमिनार में रिटायर्ड आईएएस अधिकारी जाकिर हुसैन मुख्य अतिथि एवं रिटायर्ड जज अयूब खान की अध्यक्षता एवं मौलवीं सईद साहब की संरक्षण में ये सेमिनार आयोजित होगा। इसमें स्कॉलर संस्थान के योगदान पर जोर देते हुए अपने विचार व्यक्त करेंगे। इस मौके पर टोंक प्रोग्रेसिव कमेटी के संयोजक एवं संरक्षक सरताज अहमद एडवोकेट, सदर मुफ्ती आदिल नदवी, समाजसेवी राजेंद्र गोयल, सेठ मोइनुद्दीन निजाम, पूर्व सभापति अली अहमद, लक्ष्मी जैन, अशोक बैरवा, आदि मुख्य रुप से मौजूद रहेंगे। मौलाना अबुल कलाम आज़ाद अरबी फारसी शोध संस्थान की निदेशालय के रुप में स्थापना वर्ष 1978 में राजस्थान सरकार द्वारा की गई थी शुरू में इसे ‘निदेशालय अरबी फारसी शोध संस्थान’ के नाम से जाना जाता था, जिसे बाद में 1981 में भारत के प्रथम शिक्षा मंत्री और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के नाम पर समर्पित किया गया। संस्थान टोंक की पूर्व रियासत की समृद्ध तहजीबी विरासत का प्रतीक है। संग्रह में 8 हज़ार से अधिक दुर्लभ हस्तलिखित ग्रंथ 27 हज़ार से अधिक मुद्रित पुस्तकें, हजारों पुराने फरमान, दस्तावेज और भूतपूर्व रियासत टोंक के महकमा शरीअत के 65 हज़ार से ज्यादा फैसले शामिल हैं। यहां दुनिया की सबसे बड़े साइज की कुरान शरीफ सहित संस्थान में महाभारत, रामायण सहित कई अन्य धार्मिक एवं सामाजिक ग्रंथों के फारसी अनुवाद और मध्य कालीन इस्लामी साहित्य तक का अनमोल खजाना संजोए हुए हैं। अब तक इस संस्थान में देश विदेश के 50 से अधिक स्कॉलर यहां आ चुके हैं पूर्व राष्ट्रपति, प्रमुख विद्वान और कई वीवी आईपी इस संस्थान का दौरा कर चुके हैं। यह संस्थान अरबी, फारसी, उर्दू, इस्लामी अध्ययन, सूफीवाद, चिकित्सा, दर्शन और मध्यकालीन इतिहास के शोध के लिए विश्व प्रसिद्ध है। वर्तमान में संस्थान डिजिटाइजेशन के दौर से गुजर रहा है। हाल के वर्षों में 8,000 दुर्लभ ग्रंथों का डिजिटलीकरण पूरा हो चुका है और वेबसाइट पर भी उपलब्ध है इसे दुनिया भर के शोधकर्ता ऑनलाइन इन ग्रंथों का अध्ययन कर चुके हैं इस संस्थान में कर्मचारियों की कमी एक चुनौती बनी हुई है संस्थान की महत्ता को देखते हुए इसे विकसित किए जाने के लिए टोंक प्रोग्रेसिव कमेटी अभियान के तहत कार्य कर रही है। देश के इस इकलौते संस्थान के विकास के लिए केंद्र सरकार को विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है।












