बुरहानपुर (अकील ए आज़ाद) जिले की बहूचकित पानगरी बाँध परियोजना से प्रभावित आदिवासी किसान पिछले दो वर्षों से निरंतर आंदोलन कर रहे हैं। उनका आरोप है कि उन्हें अब तक उचित मुआवजा नहीं मिला है और न ही सरकार ने उनकी समस्याओं पर कोई ठोस कदम उठाया है। किसानों का कहना है कि यह स्थिति लोकतंत्र की नहीं, बल्कि अफसर तंत्र की है—जहाँ निर्णय जनता के हित में नहीं, बल्कि सत्ता और व्यवस्था की सुविधा के अनुसार लिए जाते हैं। दो वर्षों से लगातार विरोध जताने के बावजूद न तो संबंधित विभागों के अधिकारियों ने मामले पर संज्ञान लिया और न ही प्रशासन के स्तर पर कोई सार्थक पहल हुई। इसी उपेक्षा ने आदिवासी किसानों को ऐसे विरोध प्रदर्शनों के लिए मजबूर कर दिया, जिसमें उन्हें अपना मुंह काला कर, मुर्गा बनकर प्रदर्शन करना पड़ा, ताकि सरकार का ध्यान उनकी ओर जाए। यह स्थिति दर्दनाक है, बल्कि हमारे लोकतंत्र की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है। आजादी के 70 से अधिक वर्ष बीत जाने के बाद भी आदिवासी समुदाय अपना मूल अधिकार भूमि, मुआवजा और सम्मान पाने के लिए संघर्षरत है। विकास परियोजनाओं के नाम पर उनकी जमीनें तो ली जाती हैं, पर उन्हें न्याय और पुनर्वास देने में प्रशासन की उदासीनता साफ दिखाई देती है। किसानों का साफ कहना है कि जब तक उन्हें उचित मुआवजा और उनका हक नहीं मिलेगा, उनका आंदोलन जारी रहेगा। यह संघर्ष सिर्फ मुआवजे का नहीं, बल्कि पहचान, अधिकार और सम्मान का है। सरकार और प्रशासन को चाहिए कि वे संवेदनशीलता दिखाएँ, किसानों की समस्याओं को समझें और उनकी मांगों का उचित समाधान निकालें। यही सच्चे लोकतंत्र की पहचान है—जहाँ जनता की आवाज सुनी जाती है, न कि उपेक्षित कर दी जाती है।











