Saturday, October 17, 2026
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धार्मिक आस्था और परंपरा की ज्योत को अटूट विश्वास के साथ ऐसे प्रज्वलित कर रखा है

बुरहानपुर (अकील ए आज़ाद) धार्मिक आस्था और परंपरा की ज्योत पिछले सत्तावन वर्षों से प्रज्वलित कर रही नवदुर्गा उत्सव समिति मां के श्रृंगार में आधा क्विंटल से अधिक चांदी का उपयोग, सदस्यों की मेहनत और समर्पण से कायम है गौरवशाली परंपरा धार्मिक आस्था, अटूट विश्वास और वर्षों पुरानी परंपराओं को सहेजने का उदाहरण प्रस्तुत कर रही नवदुर्गा उत्सव समिति आज भी अपनी गौरवशाली परंपरा को पूरी शान के साथ निभा रही है। लगभग सत्तावन वर्ष पूर्व शहर के गणमान्य नागरिकों द्वारा गठित इस समिति ने समय के साथ अपनी अलग पहचान बनाई है। मां दुर्गा के प्रति श्रद्धा और भक्ति से शुरू हुआ यह धार्मिक आयोजन आज भी उसी उत्साह और समर्पण के साथ जारी है।समिति का गठन शहर के गणमान्य नागरिकों ने धार्मिक परंपराओं को संगठित रूप से आगे बढ़ाने और मां दुर्गा की आराधना को भव्य स्वरूप प्रदान करने के उद्देश्य से किया था। समिति के पंजीकृत होने के बाद से ही धार्मिक आयोजनों को व्यवस्थित ढंग से संचालित किया जाता रहा है। वर्षों की इस यात्रा में अनेक बदलाव आए, लेकिन मां के प्रति श्रद्धा और परंपराओं को कायम रखने का संकल्प आज भी अडिग है।नवदुर्गा उत्सव की सबसे विशेष बात माता रानी का भव्य और आकर्षक श्रृंगार कि है। समिति द्वारा मां के श्रृंगार में आधा क्विंटल से अधिक चांदी के साथ सोने का भी उपयोग किया जाता है। आभूषणों से सुसज्जित माता रानी का दिव्य स्वरूप श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बनता है। मां के दर्शन करने पहुंचने वाले भक्तों को यहां धार्मिक आस्था, भव्यता और आध्यात्मिक वातावरण का अनूठा संगम देखने को मिलता है। इस गौरवशाली परंपरा को बनाए रखने के पीछे समिति के सदस्यों की वर्षों की मेहनत, लगन और समर्पण महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। धार्मिक आयोजन की तैयारियों से लेकर व्यवस्थाओं तक सदस्य अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हैं, ताकि श्रद्धालुओं को माता रानी के दर्शन और पूजा-अर्चना का बेहतर अवसर मिल सके। नवदुर्गा उत्सव समिति की सत्तावन वर्षों की यह यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन की कहानी नहीं, बल्कि शहर की आस्था, एकता और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक भी है। समिति के सदस्य आज भी इसी संकल्प के साथ आगे बढ़ रहे हैं कि मां दुर्गा की आराधना और वर्षों पुरानी परंपरा आने वाली पीढ़ियों तक इसी श्रद्धा और भव्यता के साथ पहुंचती रहे।

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