बुरहानपुर (अकील ए आज़ाद) मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण SIR को लेकर कांग्रेस देशभर में विरोध प्रदर्शन कर रही है। मध्यप्रदेश में भी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी के नेतृत्व में आंदोलन हुआ और इसके बाद जिलों में प्रदर्शन का आह्वान किया गया। लेकिन बुरहानपुर में विरोध का मुद्दा जितना महत्वपूर्ण था, उससे ज्यादा चर्चा विरोध के दो अलग अलग आयोजनों को लेकर होने लगी। शहर कांग्रेस और ग्रामीण कांग्रेस ने अलग अलग कार्यक्रम कर यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या जिले में पार्टी संगठन एक मंच पर खड़ा है या अंदरूनी खींचतान अभी भी हावी है? एक ही पार्टी, एक ही प्रदेश नेतृत्व का निर्देश और एक ही मुद्दा फिर कार्यक्रम अलग अलग क्यों यही सवाल अब कांग्रेस कार्यकर्ताओं और राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बन रहा है। विरोध प्रदर्शन लोकतांत्रिक राजनीति का स्वाभाविक हिस्सा है, लेकिन जब एक ही संगठन के दो धड़े एक साथ खड़े होने के बजाय अलग-अलग कार्यक्रम करें तो संदेश मुद्दे से हटकरसंगठनात्मक स्थिति पर चला जाता है। दिलचस्प यह भी है कि नगर निगम चुनाव सिर पर हैं। ऐसे समय में पार्टी की ताकत का प्रदर्शन एकजुटता से होना चाहिए लेकिन बुरहानपुर में दोआयोजनों ने संगठन के भीतर समन्वय पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जैसे प्रतीकात्मक विरोध या अलग-अलग मंचों से शक्ति प्रदर्शन भले ही सुर्खियां बना दें, लेकिन जनता के सामने असली सवाल यही रहता है क्या कांग्रेस बुरहानपुर में किसी मुद्दे पर एकजुट होकर लड़ रही है या पहले अपने भीतर की दूरी कमकरने की जरूरत हैआंदोलन का मुद्दा राष्ट्रीय हो सकता है लेकिन बुरहानपुर में दो मंचों ने स्थानीय राजनीति का अलग ही संदेश दे दिया। निगम चुनाव से पहले यह तस्वीर कांग्रेस के लिए संगठनात्मक चुनौती पर चर्चा को जरूर जन्म देती है।


