बुरहानपुरमध्य प्रदेश

सांप्रदायिक सद्भाव एक इस्लामी अनिवार्यता—-स्कॉलर

बुरहानपुर (अकील ए आज़ाद) भारत के आध्यात्मिक इतिहास को स्वीकार करते हुए, सूफी उपमहाद्वीप के सामाजिक जीवन के केंद्र में इस्लाम को समाहित करने में सक्षम हुए। इससे गंगा-जमुनी तहज़ीब का उदय हुआ, जो धार्मिक सांस्कृतिक संवाद और मानवीय मूल्यों की एक जीवंत मिसाल है। यह परंपरा इस बात का प्रमाण है कि इस्लाम की आत्मा संकीर्णता में नहीं, बल्कि समावेशिता और प्रेम में निहित है।इस्लाम के मूल स्रोत क़ुरआन और हदीस सांप्रदायिक सद्भाव को केवल सामाजिक आवश्यकता नहीं, बल्कि एक नैतिक और धार्मिक कर्तव्य के रूप में प्रस्तुत करते हैं। हमने तुम्हें एक पुरुष और एक स्त्री से पैदा किया और तुम्हें जातियों और क़बीलों में बाँटा ताकि तुम एक-दूसरे को पहचानो इस से यह स्पष्ट है कि विविधता संघर्ष के लिए नहीं, बल्कि आपसी समझ और सम्मान के लिए है। सूफी संतों औलिया और बुल्ले ने प्रेम, सेवा और करुणा के माध्यम से इस्लामी मूल्यों को जन-जन तक पहुँचाया। आज भी हर धर्म, जाति और वर्ग के लोगों के लिए खुला हैं। यह व्यवहारिक इस्लाम है जो दिलों को जोड़ता है, दीवारें नहीं खड़ी करता।समकालीन भारत में, जहाँ सांप्रदायिक तनाव बार-बार उभरते हैं, इस्लामी शिक्षाओं की यह सद्भावनापूर्ण व्याख्या और भी प्रासंगिक हो जाती है। इस्लाम ज़ोर देता है कि निर्दोष मानव की हत्या पूरी मानवता की हत्या के समान है और एक जीवन को बचाना पूरी मानवता को बचाने के बराबर है।सांप्रदायिक सद्भाव कोई वैकल्पिक विचार नहीं, बल्कि इस्लाम की बुनियादी अनिवार्यता है। भारतीय समाज की बहुलतावादी आत्मा और इस्लामी नैतिकता दोनों मिलकर शांति, सहिष्णुता और साझा भविष्य की राह दिखाते।

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